चुनाव प्रणाली बदलने में पार्टियों की हिचक!

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 भर में चुनाव की कई तरह की पद्धतियां प्रचलन में हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रियता पद्धति को भारत में अपनाया गया है। इसे फर्स्ट पास्ट द पोस्ट यानी जिसे सबसे ज्यादा वोट मिले, उसकी जीत होती है। पिछले कुछ समय से इस प्रणाली को बदलने पर विचार हो रहा है। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सहित बहुत सी पार्टियों को इसमें हिचक है। हालांकि कांग्रेस और सीपीएम जैसी कई पार्टियां इसमें प्रयोग के लिए तैयार हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस और कुछ दूसरी पार्टियों ने सबसे ज्यादा वोट मिलने पर जीत की मौजूदा प्रणाली के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सूची प्रणाली को भी शामिल करने का सुझाव दिया है।

असल में पिछले दिनों कार्मिक, जनशिकायत, कानून और न्याय मामलों की संसदीय समिति ने इस बारे में पहल की थी। अप्रैल में समिति के अध्यक्ष आनंद शर्मा ने सभी पार्टियों को छह पन्नों की एक प्रश्नावली भेजी थी। पिछले दिनों कई पार्टियों ने इस पर अपनी राय भेजी है। कांग्रेस, सीपीएम, एनसीपी, बसपा आदि ने मौजूदा प्रणाली में बदलाव की जरूरत बताई है। लेकिन भाजपा ने संसदीय समिति के सवालों का जवाब नहीं भेजा है। जाहिर है इस समय मौजूदा प्रणाली की सबसे बड़ी लाभार्थी भाजपा है इसलिए उसने चुप्पी साध ली है। हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियों को इस प्रणाली का लाभ नहीं मिला है।

बहरहाल, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही मौजूदा प्रणाली को बदलने की चर्चा चल रही है। पिछले चुनाव में भाजपा को 31 फीसदी वोट मिले और उसने आधी से ज्यादा सीटें जीत लीं। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के 42.63 फीसदी वोट मिले और उसने प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीत लीं। जबकि बहुजन समाज पार्टी को 20 फीसदी वोट मिले और एक भी सीट नहीं मिली। इसी तरह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 39 फीसदी वोट पर 312 सीटें जीतीं, जबकि 22 फीसदी पर सपा को 45 और 21 फीसदी वोट पर बसपा को सिर्फ 19 सीटें मिलीं।

अब कई पार्टियां चाहती हैं की आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सूची प्रणाली का मिला जुला रूप लागू किया जाए। इससे पार्टियों को मिले वोट के अनुपात में सीटें आवंटित की जाती हैं। इसके जरिए सभी वर्गों, समूहों और पार्टियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है। लेकिन भारत में इसे लागू करने में कई किस्म की व्यावहारिक दिक्कतें आएंगी। इसका कारण यह है कि भारत में पार्टियों की संख्या बहुत ज्यादा है और कई पार्टियों अलग अलग राज्यों में बहुत मजबूत हैं, जहां उनको अच्छा खासा वोट मिलता है। अगर सबको आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर सीटें मिलने लगेंगी तो कम से कम लोकसभा में किसी एक पार्टी को बहुमत मिलने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। तभी इस पर बहस तो चलेगी, पर फैसला होना संभव नहीं दिख रहा है।