कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी : मथुरा में यहां आज भी हंसते-खेलते मिल जाते हैं कान्‍हा

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श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा
जन्माष्टमी का त्योहार करीब आ रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते ही भक्तों को उनकी जन्मस्थली की याद आ जाती है तो आइए चलें श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा जी के दर्शन करने। भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों के लिए मथुरा नगरी सदा से ही दर्शनीय और पूजनीय रही है। धर्म, दर्शन, कला एवं साहित्य के क्षेत्र में इसका अद्वितीय योगदान रहा है। सूरदास, हरिदास और महर्षि दयानंद के गुरु विराजानंद जैसे महान संतों का भी नाम इस पवित्र तीर्थस्थल से जुड़ा हुआ है।
नगर का इतिहास
प्राचीनकाल में इसे मधुवन कहा जाता था। कालांतर में अपभ्रंश रूप से यह मथुरा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यहां भगवान श्रीकृष्ण के मामा कंस का राज्य था, जिसके अत्याचारों से उसकी प्रजा दुखी रहती थी। यहां तक कि उसने अपनी बहन देवकी को पति वसुदेव सहित बंदी बना लिया था। कंस ने उनकी सात संतानों को जन्म लेते ही मार डाला लेकिन आठवीं संतान कृष्ण के रूप में स्वयं नारायण ने अवतार लिया। उनकी माया से कंस के सभी पहरेदारों को नींद आ गई। तब वसुदेव जी ने यमुना पार करके कान्हा जी को नंद बाबा और यशोदा माता के घर गोकुल धाम पहुंचा दिया।
श्रीकृष्ण की जन्मभूमि
श्रीकृष्ण जन्मभूमि में गर्भगृह, दर्शन-मंडप, केशवदेव मंदिर और भागवत भवन आदि प्रमुख हैं। जिस स्थल पर देवकी और वसुदेव को बंदी बनाकर रखा गया था, वहां की खुदाई में मिले प्राचीन गर्भगृह और सिंहासन को भी सुरक्षित रखा गया है। गर्भगृह की छत पर एक बरामदा बना हुआ है, जिस पर संगमरमर के पत्थर लगे हैं। ऐसा कहा जाता है कि उस पर भगवान श्रीकृष्ण की छवियां स्वत: उभर आई हैं। यहां स्थित केशवदेव मंदिर सबसे प्राचीन है, जहां भगवान के अति सुंदर बाल विग्रह सुशोभित हैं। इसी मंदिर के परिसर में भागवत भवन है, जिसके खंभों पर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की छवियां अंकित की गई हैं। मंदिर की छत पर भगवान की रास लीला के सुंदर चित्र अंकित हैं, जो आने वाले सभी भक्तों का मन मोह लेते हैं। इसी मंदिर की परिक्रमा में ताम्रपत्र पर संपूर्ण श्रीमद्भगवत गीता लिखी हुई है। भगवान के जन्मस्थल के निकट ही एक विशाल कुंड है। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण के शैशवकाल में उनके वस्त्र इसी कुंड में धोए जाते थे। इसीलिए इसे पोतड़ा कुंड कहा जाता है।
अन्य दर्शनीय स्थल
मथुरा के निकटवर्ती दर्शनीय स्थलों में गोकुल सबसे प्रमुख है। साथ ही नंदगांव, संकेतवन, बरसाना, प्रेम सरोवर, गिरिराज गोवर्धन, गोकुल सरोवर, गीता मंदिर, राधा और श्याम कुंड प्रमुख है। दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित केशव मंदिर लाल पत्थरों से बना है लेकिन इसका प्रवेश द्वार राजपूताना शैली में निर्मित है। यहां 50 फीट ऊंचा ध्वज स्तंभ है, जो सोने के आवरण से ढका हुआ है। जहां नंद बाबा का महल था, उसी स्थान पर आजकल श्रीकृष्ण-बलराम का मंदिर है। श्रीकृष्ण जन्माष्टïमी के अवसर पर यहां देश-विदेश से असंख्य श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

विश्वप्रसिद्ध छप्पनभोग
भगवान को दूध से बनी सभी चीज़ें बेहद प्रिय हैं और उनकी नगरी होने की वजह से यहां मलाई-घी और मक्खन जैसी चीज़ें भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं। शुद्ध खोये से बने मथुरा के पेड़े विश्वप्रसिद्ध हैं। यहां भगवान की मूर्तियों को सजाने वाले वस्त्र, आभूषण और मंदिर की सजावट संबंधी सामग्री सस्ते दरों पर मिल जाती है। यहां दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पूजा के अवसर पर भगवान को छप्पनभोग चढ़ाया जाता है, जो स्वादिष्ट होने के साथ इतना सुंदर होता है कि लोग इसके दर्शन मात्र से धन्य हो जाते हैं।