रोहिंग्या का दुनिया करे क्या?

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पर पहले मुसलमान की सोचें?  वे क्या करें इन रोहिंग्या मुसलमानों का? कहते है गुजरे शुक्रवार को अरब देशों की मस्जिदों में रोहिंग्या को ले कर बोला गया। तभी अऱब-खाडी देशों के सोशल मीडिया पर ऐसा हल्ला हुआ कि दुनिया सोचने लगी है। सयुंक्त राष्ट्र से ले कर पश्चिमी देशों की सरकारों, मीडिया में सोचा जाने लगा है कि म्यांमार पर कैसे दबाव बनाएं?  भारत सरकार भी फंसी है। भारत के गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने कहा था कि भारत में घुसे रोहिंग्या को लौटना होगा। पर दुनिया का दबाव बना तो बांग्लादेश को मदद करने से ले कर शरणार्थियों की मानवीय चिंता दिखलाई जा रही है। उधर रोहिंग्या के साथ पाकिस्तान के आंतकियों के जुड़े होने की बहस भी टीवी चैनलों पर चलवाई जा रही है। भारत के मुस्लिम संगठन अलग रोहिंग्या के हवाले ताकत दिखाने की कोशिश में हैं। मतलब मोदी सरकार म्यांमार सरकार के खिलाफ सख्ती बरते। रोहिंग्या शरणार्थियों को आने दे। वह उनकी चिंता करे। सोशल मीडिया पर लुधियाना में रोहिंग्याओं के लिए मुस्लिम आबादी के उमड़ पड़ने के जो पोस्ट दिखे हंै और मुस्लिम संगठनों ने प्रदर्शन का जो सिलसिला शुरू किया है उसने केंद्र की राष्ट्रवादी हिंदू सरकार को दुविधा में डाल दिया है।

अधिक विकट स्थिति मुसलमानों की है। ध्यान रहे मई 2012 से रोहिंग्या प्रताड़ित हैं। म्यांमार के पश्चिमी राज्य रखाइन की राजधानी सिटवे में मई 2012 से अरखनीज बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों में झगड़ा हुआ था। रोहिंग्याओं का भागना शुरू हुआ। तब सऊदी अरब अकेला देश था जिसने रोहिंग्या मुसलमानों की चिंता की। कोई ढाई लाख रोहिंग्याओं के लिए दरवाजे खोले। शाह अब्दुला ने रेजिडेंसी परमिट दिलाए। रोजगार, शिक्षा की सुविधा दी। मगर उस शरण, मदद के साथ फिर रोहिंग्याओं को भड़काने, कट्टर बनाने में सऊदी हाथ भी बूझा गया। म्यांमार के रखाइन प्रांत में आंतकी गतिविधियां हुई तो मलेशिया,  बांग्लादेश और इंडोनेशिया में बौद्धों पर हमले की घटनाओं से ले कर जकार्ता में एक बौद्ध केंद्र को बम से उड़ा देने की बातों के दोतरफा असर हुए। एक तरह म्यांमार के बौद्धों में माहौल बना कि इन्हे भगाना है और सऊदी अरब की वहाबी कटट्टरता झगड़े के पीछे है।

अपना मानना है कि मामला वैश्विक पैमाने पर मुसलमान के प्रति दूसरे धर्मों के बदले रवैये से प्रेरित है। सोचें कि अंहिसा परमों धर्म मानने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी यदि म्यांमार ( श्रीलंका में भी) मुसलमानों से खतरा मानते हैं। चार प्रतिशत मुसलमान से म्यांमार के 90 प्रतिशत बौद्व चिंता में है तो समझा जा सकता है कि इस्लाम के जेहादियों ने सब तरफ क्या राय बनवा दी है?

जैसे भारत में कई हिंदू सोचते हैं वैसा बौद्धों के मन में पैठा हुआ है कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। यदि इसे रोका नहीं तो भारत और इंडोनेशिया की तरह बौद्ध विरासत म्यांमार में भी ख़त्म हो जाएगी। रोहिग्या बर्मीज महिलाओं को शादी के लिए आकर्षित करते हैं और शादी के बाद उनका धर्मांतरण करा मुसलमान बनाते हैं। ये अपने को ग़रीब बताते हैं मगर जमीने खरीद रहे हैं। बंदूक और रॉकेट्स ख़रीदते हैं। नई मस्जिदे बना रहे हैं। ये मुस्लिम बाहरी हैं और ये सोने के स्तूपों की ज़मीन पर अतिक्रमण कर कब्जा कर रहे हैं। मुसलमान क्योंकि रखाइन प्रांत में ज्यादा है। इसलिए वहां के अरखनीज बौद्धों के मन में बात पैठ गई है कि रखाइन का इस्लामीकरण हो रहा है हालांकि ये सब अवैध बंगाली प्रवासी हैं। ध्यान रहे म्यांमार के 1982 के नागरिकता नियम में ये रोहिंग्या नागरिकता के हकदार नहीं हंै। इन्हे नागरिकता नहीं मिली हुई है। 1982 के नागरिकता क़ानून अनुसार यदि आवेदक म्यांमार में आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड 135 जातीय समूह से ताल्लुक नहीं रखता है तो उसे नागरिकता नहीं मिलेगी।

मतलब मामला वैसे ही है जैसे असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को नागरिकता मिले या न मिले? म्यांमार ने अपने नागरिकता कानून में देश की मूल आबादी को धर्म-नस्लीय आधार पर ऐसे परिभाषित किया है जिससे मुसलमान दूसरे दर्जे के लोग है। कितनी गंभीर और विचित्र बात है यह! इसलिए ज़ड़ में रोहिंग्या मुस्लिम के साथ भेदभाव है तो उनकी नाराजगी, गुस्से को सऊदी अरब आदि ने यह कहते हुए चुपचाप समर्थन दिया कि संर्घष करो। हम साथ हैं।

इस पूरी हकीकत से अधिकांश लोग बेखबर हंै। इस मामले में अकेले चीन ने हकीकत को आधार बना  दो टूक स्टेंड लिया है। वह म्यांमार की बौद्व सरकार के पक्ष में है। जबकि भारत और मोदी सरकार दुविधा में फंसी दिख रही है। रोहिंग्या के साथ मुसलमान और अरब-खाडी देशों व संयुक्त राष्ट्र की ताजा चिंता से मोदी सरकार हडबडा गई है वहीं चीन पूरी तरह म्यांमार सरकार के साथ है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की इस ताजा टिप्पणी पर गौर करें -”संकट को मुस्लिम चरमपंथियों ने पैदा किया है। इन्होंने म्यांमार में सरकारी बलों पर हमला शुरू किया था। तब म्यांमार के सुरक्षाबलों को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिम और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच जातीय और धार्मिक संघर्ष की ज़मीन लंबे समय से तैयार हो रही थी।”

यह चीन का अधिकृत रूख है। तब भारत सरकार क्या करें?

मजेदार पहलू इस्लामी देशों के रूख का है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया यदि मुस्लिम देश है, सऊदी अरब और खाडी के देश यदि मुस्लिम भाईचारे के नाम पर राजनीति करते है तो इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी की क्यों नहीं इस मसले पर बैठक हुई? एक विदेशी अखबार में दिलचस्प टिप्पणी थी कि कतर ने अमेरिका के टेक्सास में आए तूफान की मदद के लिए तीन करोड डालर दिए मगर बांग्लादेंश में पहुंचे 3,70,000 रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए ऐसी पहल नहीं की। सऊदी अरब और कतर दोनों ने म्यामांर के लिए तेल पाइप लाईन, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के काम किए है।

पेंच यह भी है कि यदि म्यांमार रोहिंग्या को बंगाली मानता है। उसे नागरिकता नहीं दी हुई है तो बांग्लादेश क्यों नहीं रोहिंग्या को अपना कर संकट खत्म कराएं?

म्यांमार  का आज नंबर एक समर्थक चीन है। दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी म्यांमार के साथ है। श्रीलंका के बौद्वध संगठन म्यांमार के चरमपंथी बौद्व संगठनों की हौसलाबुंलदी कर रहे है।

क्यों? इसलिए कि इस्लाम, मुसलमान के प्रति अंहिसागामी बौद्व धर्म भी असहिष्णु हो गया है! म्यांमार की कहानी वही है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश की है। इन देशों में जैसे हिंदू खत्म किए गए वैसे म्यांमार का रोहिग्याओं के प्रति रूख है। तय माने कि न म्यांमार की सेना और उसकी मौजूदा सरकार दुनिया की परवाह करेगी और न रोहिंग्याओं का भागना रूकेगा। न वापसी होगी। सो मसला अनिवार्य तौर पर गंभीर बनेगा। ये रोहिंग्या भारत या बांग्लादेश में खपेंगे।

भारत का जहां सवाल है उसकी सरकार के बस में कुछ नहीं है। मोदी सरकार दो टूक स्टेंड नहीं ले सकती। और सोचे चीन पर। वह रोहिंग्याओं के खिलाफ दो टूक स्टेंड के बावजूद पाकिस्तान का भी प्रिय है तो म्यांमार का भी।