मेट्रो का ‘जादू’ क्या पड़ने लगा है भारी?

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नई दिल्ली। हर शहर पब्लिक ट्रांसपॉर्ट के लिए मेट्रो की इच्छा रखता है लेकिन इस वक्त दिल्ली से लेकर लखनऊ तक मेट्रो का किराया बहस का सबब बना हुआ है। एक जनधारणा बनती दिख रही है कि मेट्रो से सफर तय करने को जो किराया चुकाना पड़ रहा है, वह दूरी के हिसाब से ज्यादा है। इस किराये के वक्त के साथ बढ़ने की ही संभावना है।
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि लागत के नजरिए से यह सबसे महंगा शहरी ट्रांसपॉर्ट साधन है। देश की राजधानी दिल्ली का ही उदाहरण देखें। दिल्ली में जब इसका 65 किलोमीटर का पहला फेज बना तो उसकी लागत थी 10 हजार 571 करोड़ रुपये यानी औसतन लागत 162 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर। दूसरा फेज था 125 किलोमीटर का और लागत आई 18 हजार 783 करोड़ रुपये यानी प्रति किमी खर्च हुए 150 करोड़ रुपये। तीसरे फेज का निर्माण शुरू हुआ तो इसकी लागत बढ़ गई।
अभी तीसरे फेज का कार्य चल रहा है और सिर्फ दिल्ली की सीमाओं में इसके 103 किलोमीटर के प्रॉजेक्ट की लागत है 35,242 करोड़ रुपये यानी औसत प्रति किमी निर्माण खर्च आ रहा है 342 करोड़ रुपये। अगर दिल्ली मेट्रो के चौथे फेज की बात करें तो इसकी डीपीआर में 104 किलोमीटर की लाइनों का खर्च आंका गया है 55 हजार करोड़ रुपये यानी प्रति किमी 528 करोड़ रुपये।
लोन का भार

चूंकि मेट्रो प्रॉजेक्ट लोन लेकर बनाए जाते हैं। ऐसे में उसकी किस्तें भी चुकानी होती हैं। दिल्ली मेट्रो का हाल यह है कि अभी इसे 26 हजार करोड़ रुपये का लोन चुकाना है। जाहिर है कि उसे इसकी भारी भरकम किस्त का भी इंतजाम करना होगा। यहां याद रहे कि अभी तीसरे फेज के लिए जो लोन लिया जा रहा है, उसकी किस्तों का भुगतान शुरू नहीं हुआ।
रखरखाव और ऑपरेशन खर्च

इतने भारी भरकम खर्च से बने प्रॉजेक्ट को चलाना और उसे मेंटेन करना भी सस्ता नहीं है। दिल्ली मेट्रो का कहना है कि 2009 के बाद से उसके रखरखाव और ऑपरेशन खर्च में बढ़ोतरी हुई है। बिजली खर्च में 105 फीसदी, स्टाफ खर्च में 139 फीसदी और रिपेयर व मेंटिनेंस खर्च में 213 फीसदी की वृद्धि हुई है। ऐसे में वह अपने खर्चे पूरे करने के लिए किराया बढ़ा रही है, न कि मुनाफा कमाने के लिए। यही नहीं, मेट्रो की ट्रेनों को 30 साल बाद बदलना होता है। जाहिर है कि उसके लिए भी मेट्रो को आमदनी में से कुछ हिस्सा बचाकर रखना होगा ताकि उस वक्त नए कोच खरीदे जा सकें।
अन्य शहरों को सबक
मेट्रो के किराए का यह गणित दूसरे उन शहरों के लिए बड़ा सबक है, जहां वोट बैंक के लिए मेट्रो लाने की कवायद चल रही है। दिल्ली जैसा शहर जहां रोजाना मेट्रो में 27 लाख पैसेंजर सफर करते हैं। मेट्रो को प्रॉपर्टी डिवेलपमेंट से भी आमदनी होती है। वहां जब मेट्रो का सालाना घाटा 250 करोड़ से अधिक हो तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लखनऊ, चेन्नै, कोच्चि, जयपुर, अहमदाबाद, नागपुर, बेंगलुरु जैसे शहरों की मेट्रो में सफर करने वालों की जेब पर मेट्रो का किराया कितना भारी पड़ेगा। अगर किराया नहीं बढ़ाया गया तो या तो सरकारों को सब्सिडी देनी होगी या फिर इन शहरों की मेट्रो के भी डीटीसी की तरह बनने का खतरा पैदा हो सकता है। राज्य सरकारें लोगों को खुश करने के इरादे से हर छोटे शहर यहां तक कि बनारस, कानपुर और गोरखपुर तक में मेट्रो लाने का वादा करने लगी हैं। अब सवाल यह है कि मेट्रो तो आ जाएगी मगर क्या जनता इसका मोटा किराया देने के लिए तैयार होगी?