गोरखपुर त्रासदी: ‘बेनाम’ ही मौत के मुंह में समा गए 17 मासूम

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गोरखपुर। लक्ष्मी और शैलेंद्र ने दो दिन पहले ही अपने बेटे का अंतिम संस्कार किया है। उन्हें सुध-बुध नहीं है। तीन हफ्ते का उनका बेटा गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में मरने वाले बच्चों में था।
वह उन 17 नवजात शिशुओं में से था जो अभी एक महीने के भी नहीं हुए थे। उनका नामकरण भी अभी नहीं हुआ था। यह खुलासा टाइम्स ऑफ इंडिया के पास मौजूद बीआरडी अस्पताल के रिकॉर्ड से हुआ है। माता-पिता अपने बच्चों का नाम रख पाते उससे पहले ही 17 बच्चे मौत का ग्रास बन गए।
शैलेंद्र ने कहा, ‘हम उसका अंतिम संस्कार भी सही तरह से नहीं कर पाए क्योंकि उसे पुकारने के लिए कोई सही नाम ही नहीं था। हमारा बेटा महज 20 दिनों का तो था।’ शैलेंद्र का गांव जैनपुर अस्पताल से महज 15 किलोमीटर दूर है।
17 में से अधिकतर बच्चों को जन्म के फौरन बाद फेफड़े का संक्रमण हुआ था और इसलिए उन्हें निरंतर डॉक्टरी निगरानी की जरूरत थी। जिन डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल में रेफर किया था उन्होंने अपने रेफरेंस सर्टिफिकेट में साफ लिखा था कि बच्चों को नियमित ऑक्सीजन सप्लाई की जरूरत है।
शैलेंद्र ने कहा, ‘मेरे पास जो भी पैसे थे उन्हें लेकर मैं एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भागता रहा। तीन बार मैंने 350 मिली की खून की बोतल खरीदी। मेरे माता-पिता ने बच्चे के लिए पहले से खिलौने खरीदकर रखे थे। गुरुवार को उसकी मौत के बाद हमने वे सब खिलौने उसके साथ ही दफन कर दिए।’
बस्ती जिले के एक अन्य माता-पिता भी अपने चार दिन की बेटी की मौत के सदमे से उबर नहीं पाए हैं। उन्होंने शुक्रवार को ही उसका अंतिम संस्कार किया है। पेशे से किसान राजेश ने बताया, ‘हमारी और प्रतिमा की शादी 2015 में हुई थी। जब हमारे घर बेटी हुई तो सब खुश थे लेकिन फिर हमें उसकी बीमारी के बारे में पता चला। हमें बच्ची को गोरखपुर के अस्पताल में ले जाने की सलाह दी गई।’
राजेश ने कहा, ‘मैं मेडिकल रिकॉर्ड्स जलाना चाहता था लेकिन मैं ये रख लिए क्योंकि मैं सरकार को दिखाना चाहता था कि आखिर हमें कितनी मदद की गई है।’
ज्यादातर मामलों में गोरखपुर अस्पताल में रेफर करने वाले डॉक्टरों ने बच्चों के लिए ऑक्सीजन की निरंतर सप्लाई की बात लिखी थी।