मूवी रिव्यू : अब्दुल ऐंड विक्टोरिया

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अपने बाद के सालों में इंग्लैंड की रानी और भारत की महारानी विक्टोरिया ( जूडी डेंच) को एक भारतीय मुंशी अब्दुल करीम (अली फजल) की सोहबत में आराम और खुशी मिलने लगती है। आगे चलकर वही क्लर्क महारानी का उर्दू टीचर, धार्मिक सलाहकार और सबसे नजदीकी हमराज और विश्वासपात्र मित्र बन जाता है। श्राबनी बासु की किताब की अद्भुत लेकिन सच्ची कहानी पर आधारित यह फिल्म ढेर सारे भावों को लिए हुए है जो इस दोस्ती के बारे में बताती है जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। साथ ही इस दोस्ती की वजह से राजघराने में जो गुस्सा और सनक पैदा होती है उसे भी फिल्म में दिखाया गया है।
रिव्यू: स्टीफन फ्रीअर्स अपनी इस फिल्म की शुरुआत में दर्शकों को रानी विक्टोरिया के उस नीरस रूटीन से अवगत कराते हैं जिसमें रानी अपनी स्वर्ण जयंती वर्ष (1887) के दौरान सामाजिक बाध्यता की वजह से लोगों से मिलती-जुलती हैं। इसी तरह के एक राजशाही जलसे के दौरान रानी की नजर अब्दुल पर पड़ती है। बड़ी-बड़ी आंखों वाला भारतीय लड़का जो रानी को तोहफे के रूप में औपचारिक सिक्का यानी मोहर प्रदान करता है। अब्दुल को पहले ही इस बात की चेतावनी दी गई थी कि उसे रानी विक्टोरिया की तरफ बिल्कुल नहीं देखना है। बावजूद इसके अब्दुल ने अपने अंदर मौजूद बचकानी हरकतों के हाथों मजबूर होकर रानी की तरफ देखने लगा और वहां मौजूद विशेषाधिकार प्राप्त गौरवान्वित लोगों की मौजूदगी के बीच जब रानी से उसकी नजरें मिलीं तो उसने एक हल्की सी मुस्कान दे दी। प्रोटोकॉल की परवाह न करते हुए भी अब्दुल ने जो हल्की सी छेड़छाड़ करने की कोशिश की थी उससे रानी इमोशनल हो गईं। बेशक एक हिंदू अटेंडेंट के रानी पर बढ़ते प्रभाव से राजघराने के परिवार के सदस्य और नौकर परेशान होने लगते हैं लेकिन बाद में पता चलता है कि वह हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम है।
82 साल की उम्र में जूडी डेंच दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर पाने में पूरी सफल नज़र आ रहीं। स्क्रीन पर केवल उनकी मौजूदगी ही आपका ध्यान नहीं खींचेगी बल्कि उनकी निगाहों से शरारत, उदासी, अकेलापन, तड़प जैसे कई भाव आपको स्पष्ट नज़र आएंगे। उन्होंने बड़ी सहजता से अपने इस किरदार में जान डाल दी है। आपका दिल इस उम्रदराज ऐक्ट्रेस के लिए तब पसीज जाएगा जब वह खुद को लेकर खयालों में खो जाती हैं, तेज हवाएं चल रही और अब्दुल से कहती हैं, ‘जिसे भी मैंने प्यार किया वह नहीं रहा, लेकिन मैं आगे बढ़ती रही।’ डेंच ही वह वजह हैं जो इस दिलचस्प कहानी को एक ‘स्कैंडल’ में तब्दील होने से रोकती हैं।
इन अविश्वसनीय मौकों का फायदा उठाते हुए अली फज़ल खुद को लेजंड (डेंच) के सामने खड़ा कर पाने में सफल दिख रहे। स्टीफन फ्रीअर्स ने अली की ऐक्टिंग, नर्वस एनर्जी और जोश को अब्दुल के किरदार में बखूबी पिरोया है। हालांकि, उनका मुंशी वाला किरदार आपको काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर देगा, जिसे लेकर एक रहस्य अंत तक बरकरार रह जाएगा। एक इंडियन इंग्लैंड की महारानी के लिए इतना समर्पित क्यों, जिसने उसके देश पर राज किया है? यहां तक कि वह खुशी-खुशी उनके पैर पर किस करता है। क्या वह वाकई भोला-भाला है या फिर मौकापरस्त? एक व्यक्ति के रूप में वह क्या चाहता था?फिल्म की कहानी अब्दुल को सिर्फ एक तमाशबीन बना देती है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है। फिल्म वहां पर डगमगाती दिखती है, जब वह अचानक अपना गियर चेंज करती है यानी जब फिल्म अचानक एक थकाऊ ट्रैजिडी से क्रॉस कल्चर कॉमिडी की तरफ मोड़ ले लेती है।
अनियमित कहानी और इतिहास से जुड़ी गलतियों के बावजूद विक्टोरिया और अब्दुल एक दिलचस्प फिल्म है और इसे देखने के लिए जूडी डेंच एक बहुत बड़ी वजह हैं।

कलाकार जूडी डेंच, अली फज़ल, एडी इज़र्ड, अदील अख्तर, पॉल हिगिन्स, ओलिविया विलियम्स
निर्देशक स्टीफन फ्रीअर्स
मूवी टाइप Biography
अवधि 1 घंटा 52 मिनट